पं आनंद कृष्ण जी महाराज के अनुसार
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"सूर्यकुंड" गांव भरनाखुर्द में राधारानी की यथेष्ट कृपा प्राप्त सिद्धबाबा मधुसूदन दास जी महाराज
बाबा बंगदेश के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे और माता-पिता के अत्यंत लाडले थे ।
विवाह के दिन ही रात्रि में नववधू से प्रथम मिलन की बेला में वह घर से भागकर वृंदावन चले आए, और लोकालय से दूर वनों में रहकर बंसी वाले की याद में दिन व्यतीत करने लगे, गांव से मधुकरी मांग कर और यमुना जल पीकर रहने लगे, उन्होंने सुना था कि बिना गुरु दीक्षा के भगवत प्राप्ति नहीं होती, एक दिन वह केशीतीर्थ पर यमुना किनारे वृक्ष के नीचे गुरुदीक्षा की चिंता में बैठे थे, उसी समय वहां स्नान के लिए एक महात्मा आए, और उन्होंने कहा बेटा जा यमुना स्नान करके आ मैं तुझे दीक्षा मंत्र दूंगा, चिंतामणि स्वरूप वृंदावन धाम की कृपा को देखकर ये अत्यंत प्रसन्न हुए, महात्मा से दशाक्षर मंत्र प्राप्त करते ही ये आविष्ट होकर गिर पड़े , प्रकृतिस्थ होने तक महात्मा जी जा चुके थे, एक दिन यह मानसी गंगा के निकट सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के पास में पहुंचे , और भजन रीति उपदेश करने के लिए कहने लगे,
कृष्ण दास बाबा ने कांमा के सिद्ध श्री जयकृष्ण दास बाबा के पास में इनको भेजा , सिद्ध होते हुए भी जय कृष्ण दास बाबा ने कहा भाई तुम्हारे गुरु के संबंध में मेरे लिए अनुमान करना कठिन है । हमारा भजन संबंधानुगा है, इष्ट से तुम्हारा संबंध, तुम्हारे गुरु परिवार के उनसे संबंध, के अनुसार होगा, अतएव तुम रागानुगा भजन के अधिकारी नहीं , आप एकांत में बैठकर श्री राधे को पुकारो राधारानी जो करेंगे अच्छा करेंगी ।
बाबा के मन में आया भजन की विधि मुझे पता नहीं है , अब जीने से क्या फायदा, गिरिराज शिलारूपी गिरधारी को गले से बांधकर राधा कुंड में कूद पड़े , राधा कुंड के अतल तल में संज्ञा हीन अवस्था में न जाने कितने दिन पड़े रहे , चेतना आने पर उन्होंने देखा कि किसी ने इनके गले की रस्सी खोल दी है , और हाथ में एक ताल पत्र देकर उसे कुंड के तट पर लिटा दिया है ।
ताल पत्र में कुछ लिखा है इसे राधा रानी की कृपा जान ये राधा कुंड से कांमा जयकृष्णदास बाबा के यहां पहुंचे, कामा वाले बाबा ने कहा, तुम्हारे ऊपर राधा रानी की पूर्ण कृपा है , फिर भी आप राधाकुंड जाकर आर्त भाव से राधारानी को पुकारो , उन्होंने वैसा ही किया और भक्त का आर्तनाद सुनकर राधा रानी ने प्रकट होकर उपदेश किया । सूर्यकुंड भरनाखुर्द में जाकर भजन करो, वही तुम्हें अभीष्ट सेवा की प्राप्ति होगी, जो मंत्र आपको मिला है उसे हमेशा गोपनीय रखना, तब से वे सूर्यकुंड भरनाखुर्द में आकर रहने लगे । बृजवासी इनको मधुसूदन दास बाबा के नाम से जानते थे ।
राधारानी के प्रकट होकर उपदेश के बाद बाबा सूर्यकुण्ड भरनाखुर्द में रहने लगे...
एक दिन प्रिया जी ने मधुसूदन दास बाबा को स्वप्न में आदेश दिया -: तुम जिस घाट पर स्नान करते हो उसके निकट कंठ तक जल में एक शिला है , उस पर मैंने और मेरी दो सखियों ने स्नान करते समय अपने केयूर और अंगदादि रख दिए थे , उनके स्पर्श से शिला गल गई है , और उस पर आभूषणों के चिन्ह बन गए हैं , तुम उस शिला को निकालकर उसका पूजन किया करो..
बाबा कुंड के जल में प्रवेश कर उस शिला को निकालने लगे , तो राधा रानी की कृपा से वह दो ढाई मन की शिला फूल के समान प्रतीत हुई । उन्होंने सहज ही उसे उठाकर कुंड के तट पर रख दिया , आज भी लोग वहां उसके दर्शन करते हैं , तभी से मधुसूदन दासबाबा "सिद्धबाबा" के नाम से प्रसिद्ध हुए, बाबा शेषरात्रि में कुंड के तीर पर बैठकर उच्च स्वर से
"विश्वंभर गौरचंद्र वृषभानु नंदिनी राधे" नाम का कीर्तन किया करते थे , उनकी सिद्धावस्ता की बहुत सी कथायें हैं, बरसाने में फाल्गुन शुक्ला नवमी के दिन होली खेली जाती है उस दिन अपराह्न मैं सफेद वस्त्र धारण कर बाबा द्रुतगति से सीधे बरसाने की ओर भागते , बंबे के निकट पहुंचते ही , चेतना शून्य होकर गिर पड़ते , बृजवासी बालक उन्हें घेर कर खड़े हो जाते थे , श्वास प्रश्वास बहुत दीर्घ हो जाते , सायंकाल को हुंकार के साथ उठ पड़ते , उस समय तक उनके उज्जवल वस्त्र लाल रंग में भीगे होते, कुछ दिनों बाद बाबा के पैर में क्षत रोग हो गया , उनका चलना फिरना दुष्कर हो गया , तब उन्होंने किसी निर्जन स्थान में जाकर देह त्याग करने का विचार लिया , बड़े कष्ट से वे रात्रि के समय वहीं सघन वन में चले गये , बिना अन्न जल ग्रहण किए राधा रानी को पुकारते हुए मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे , राधा रानी का नाम लेकर रोते रोते मृतप्राय हो गए ,
करुणामयी मां से रहा न गया ... किशोरी जी ब्रज बालिका के रूप में रोटी और जल लेकर अपराह्न बाबा के पास में आईं, और बोली-: अरे बाबा तू या जगह काय कूं आय पड्यो है ,में तोकूं ढूंढते - ढूंढते हैरान है गई , तू कल और परसों रोटी लेबेऊं नांय आयो , मैया ने तेरे ताईं रोटी भेजी हैं , लै खाय ले...!
बाबा नें कही -: लाली तू यहां च्यों आई , तोकूं कैसे पता लग्यो कि मैं यहां हूं ...
मोए सब खबर लग जाए बाबा , अब तू रोटी खाय ले..
बाबा ने कही मोय भूख नांय , मैं नांय खाऊंगो...
खायवैगो कैसे नांय मैया नै कही है वाकूं जिमाय कें अइयो...खाय ले
बालिका को लायों प्रसाद बाबा नें पायो , किशोरी जी उनकी और देखती भई , मृदु मंद मुस्काती भई चली गई , बाबा ने अनुभव किया उनके पैर की सारी पीड़ा चली गई , पैर की पट्टी को खोल कर देखा , तो क्षत रोग का कोई भी चिन्ह ना बचा , मन में कुछ संदेह हुआ , उठकर धीरे-धीरे बालिका के घर तक आए ,
बृजमाई से पूछा मैया तेरी लाली कहां है ?
लाली तो ससुराल में है बाबा...
कब गई ??
3 महीना पहले गई बाबा..
बाबा सारा रहस्य समझ गए, घटना के प्रकाश होने के भय से बृजमाई से कुछ ना कहा , किंतु उनकी भाव मुद्रा विलक्षण प्रकार की हो गई , उनके दोनों नेत्रों से गंगा यमुना बहने लगी, हे करूणामयी राधे! कहकर रोने लगे, गोपन रखने की चेष्टा बार-बार करने पर भी घटना प्रकाश में आ गई, कार्तिक मास में बाबा ने भागवत पाठ करने की इच्छा की । ब्रजवासियों ने सारी व्यवस्था कर दी रास पंचाध्याई का पाठ होने लगा ,अंत में ब्रजवासी बालकों से हरि चर्चा करते हुए, उनके प्राण ब्रह्मरंध्र भेदकर निकल गए उसी स्थान पर उनकी समाधि आज भी विद्यमान है...
बाबा के अतिरिक्त कई संतों की तपस्या का वर्णन सूर्य कुंड पर मिलता है ।
साभार:- ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां
ब्रजभूमि का सबसे बड़ा वन महर्षि 'सौभरि वन'
आऔ ब्रज, ब्रजभाषा, ब्रज की संस्कृति कू बचामें
ब्रजभाषा लोकगीत व चुटकुले, ठट्ठे - हांसी
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